
माही, तू क्यों तू
हर ख़्वाब में आ जाती है
जिसे भूलना चाहता हूँ
उसी याद में मुस्कुराती है
माही, तू क्यों तू
इतनी अपनी लगती है
जबकि किस्मत की किताब में
मेरी कहानी नहीं लगती है
माही तू, क्यों तू
मेरी ख़ामोशी में रहती है
दूर होकर भी जाने क्यों
मेरे पास सी रहती है
माही तू, क्यों तू
दिल से उतरती ही नहीं
मैं तुझे भूल भी जाऊँ
ये बात दिल मानता ही नहीं
माही तू, क्यों तू
मेरी रातों की वजह है
तू साथ नहीं फिर भी
तेरी याद ही मेरा हमसफ़र है