मैं रोती रही, बिलखती रही,
कभी बस में, कभी ट्रेन में,
कभी तो अपने ही घर में
अपनी इज़्ज़त खोती रही।
मैं रोती रही...
दुनिया कहती रही—
“बेशर्म है, उसने क्या पहना था?”
“मर्दों की बराबरी करेगी,
तो ये सब तो होना ही था।”
मैं फिर भी आस लगाए,
हर बार खुद को खोती रही,
सबके सवालों में
अपना ही जवाब ढूँढती रही।
दर्द मेरा था,
सवाल भी मुझसे ही हुए,
मैं टूटती रही,
और लोग तमाशा देखते रहे।
मैं रोती रही...
हाँ, मैं रोती रही।