निडर बनाने आए मुझे हो, पर में लक्ष्मीबाई मर्दानी हूं
अधिकार बॉटने आाए हो लेकिन, में झलकारी अभिमानी हूँ।
ये जगत मुझ ही पर निर्भर है, जीवन की शुरुआत मुझी से होती है,
तुम आज मुझे ये उत्तर दो, स्वयं शक्ति कैसे सशक्त होती है।
कई आई रीत, कई दौर आए, मैं अडिग रही, में अचल रही,
में पितृसत्ता के बावजूद भी पुरुषों से अव्वल रही।
ज्ञान, त्त्याग और स्वाभिमान मेंरी पुष्टि इन्हीं से होती है,
तुम आज मुझे ये उत्तर दो कि स्वयं शक्ति कैसे सशक्त होती है।
न मोह है मुझको वैभव का, न ही अवसर की माँग करी,
अपने ही सामर्थ्य से मेंने सपनों की एक उड़ान भरी।
तुम भोग रहे जो तृप्ति वो उत्पन्न मुदझी से होती है।
अब तुम आज मुझे ये उत्तरदो कि स्वयं शक्ति कैसे सशक्त होती है।