
कितना वक्त हो गया खुद से मिले
एक लड़की थी जिसे मैं जानती थी,
जो रुकती थी अपने लिए
कभी कभी औरों के लिए भी|
जो जीती थी हर लम्हा
चाहे उसमें दर्द ही क्यों न हो,
जो लिखती थी वो सब जो दिल में हो,
जो सुनती थी खुद की और रुकती थी
सोचती थी|
हाँ, वो थमने से नहीं डरती थी,
पर यह जिसके साथ आजकल रात-दिन गुज़ार रही हूँ मैं
यह चलती है, दौड़ती है, दूर चली जाती है
बहुत दूर
पर वापिस नहीं आती है|
इसे डर लगता है थमने से,
फिर उन्हीं यादों के घर में रुकने से जहाँ कभी रहा करती थी
सोचती है अगर संभाल नहीं सकी
और डूब गई फिर उन्हीं यादों के बवंडर में
तो फिर कैसे दौड़ेगी,
फिर खुदको कैसे बचाएगी
— और क्या बचाएगी?
• दौड़ •