
काश वो दिन फिर आ पाते, बस्ता टाँगे, बोतल लेकर, हम फिर स्कूल जा पाते।
वही सूट, वही सलवार, दो चोटियाँ, चार किताब, न किसी कल की फ़िक्र, न आज का सवाल, बस दोस्तों के साथ हँसी बेमिसाल।
जहाँ बस्ता तो था भारी, पर ज़िंदगी का बोझ थोड़ा कम, जहाँ हर दिन खुशियों का रंग, और सारी सहेलियाँ बैठती थीं संग।
जहाँ थी तो बस शिक्षक की मार, ना कि ज़िंदगी की मार…
काश वो दिन फिर आ पाते, काश हम फिर स्कूल जा पाते। ❤️