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यादें
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यादें

Trisha
August 7, 2026 · 1 min read · 170 views
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रुकने का मन तो नहीं था

पर फिर भी कोशिश की

कि रुक जाऊं

एक और बार

एक और ख़्याल

अपना मन मारकर

दिल हारकर

खुदसे छिपाकर

पर तुम थी ही नहीं

वहाँ

पहले की तरह

शीत सी

जैसे कोई पंछी

जो रोज़ छत पर आता हो

मासी के हाथ से दाना चुगने

जो बदले में प्यार के दो बोल बोल जाये

और मुस्कुराने का एक बहाना दे जाए

पर तुम नहीं थी वहाँ

सब ख़त्म सा लगता है अब

मानो सूरज शाम में जो निकला

तो फिर वापिस आने का रास्ता भूल सा गया है

और अंधकार जो बरसों से इंतजार में था

कि कब उसे राज मिले, कब उसे ताज मिले

मेरे सामने खिलखिलाता हुआ मुझसे कह रहा हो

कोई नहीं आने वाला है, वापिस मत जा

पर मैं फिर भी गया

एक आख़िरी बार

एक आख़िरी आस

कि बस मिल जाए वो

जो ना मिलेगी यह पूरी दुनिया

मुझसे कहती थक गई

पर तुम नहीं थी वहाँ

या तुम तो हमेशा से ही थी वहाँ

~ तुम्हारा

// यादें

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Trisha
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